7-दिवसीय वैदिक चल प्राण-प्रतिष्ठा प्रक्रिया
शाब्दिक कला से साक्षात दिव्य चेतना तक का पावन सफर
प्राण-प्रतिष्ठा क्या है?
सनातन धर्म की प्राचीन वैदिक परंपरा में प्राण-प्रतिष्ठा वह अति पावन अनुष्ठान है, जिसके माध्यम से शास्त्रोक्त मन्त्रोच्चार और विधि-विधान द्वारा एक मूर्तिकला शिल्प में दिव्य प्राण-ऊर्जा (Life-Force) का आवाहन किया जाता है।
देवप्राण में, हमारे पूज्य एवं अनुभवी वैदिक आचार्यों द्वारा प्रत्येक पावन मूर्ति को आपके गृह-मंदिर में स्थापित होने से पहले 7 दिनों के पवित्र संस्कारों से गुज़ारा जाता है, ताकि आप अपने घर में केवल एक मूर्ति ही नहीं, बल्कि साक्षात दिव्य उपस्थिति का स्वागत कर सकें।
7-दिवसीय प्राण-प्रतिष्ठा के पावन चरण (The 7 Steps)
चरण 1: संकल्प एवं देव-आवाहन (Sankalpa & Deva-Avahana)
अनुष्ठान के प्रथम दिन, आचार्य जी द्वारा यजमान और भक्त के कल्याण हेतु शुद्ध चित्त से संकल्प लिया जाता है। इसके पश्चात पवित्र वैदिक मन्त्रों के साथ सम्बंधित देवी-देवता का आवाहन करके उन्हें पावन पीठ पर विराजमान होने की प्रार्थना की जाती है।

चरण 2: जलाधिवास (Jaladhivas)
द्वितीय दिवस में मूर्ति को पवित्र नदियों के जल एवं गंगाजल में जलमग्न (अधिवास) किया जाता है। जल तत्व मूर्ति की समस्त भौतिक अशुद्धियों को दूर कर उसे परम सात्विक और ऊर्जावान बनाता है।

चरण 3: अन्नाधिवास (Annadhivas)
तृतीय दिवस में मूर्ति को पवित्र धान्यों (अनाज जैसे गेहूं, चावल, तिल आदि) के मध्य अधिवासित किया जाता है। अन्न पृथ्वी तत्व का प्रतीक है, जो मूर्ति में स्थायित्व और पोषण प्रदान करने वाली ऊर्जा का संचार करता है।

चरण 4: पुष्पाधिवास (Pushpadhivas)
चतुर्थ दिवस में मूर्ति को सुगंधित एवं ताजे दिव्य पुष्पों से आच्छादित किया जाता है। पुष्पों की खुशबू और सात्विकता से वातावरण में परम शांति, भक्ति और मधुरता की ऊर्जा प्रवाहित होती है।

चरण 5: फलाधिवास (Phaladhivas)
पंचम दिवस में विभिन्न ऋतु-फलों के सानिध्य में मूर्ति को स्थापित किया जाता है। फल पूर्णता और शुभ फल प्राप्ति का प्रतीक हैं, जो मूर्ति में समृद्धि और आरोग्यता के भाव जागृत करते हैं।

चरण 6: वस्त्राधिवास (Vastradhivas)
षष्ठम दिवस में प्रभु को रेशमी एवं पवित्र वस्त्र धारण कराए जाते हैं। यह संस्कार मूर्ति को आवरण प्रदान कर उसमें तेज़, गरिमा और दिव्य आभा का विस्तार करता है।

चरण 7: नेत्रोन्मीलन एवं प्राण-प्रतिष्ठा (Netronmeelan & Prana Pratishtha)
अंतिम एवं सबसे महत्वपूर्ण दिवस पर, आचार्यों द्वारा विशेष स्वर्णिम शलाका और शहद/घी से प्रभु के पावन नेत्रों को खोला जाता है (नेत्रोन्मीलन)। तत्पश्चात बीजाक्षरों एवं वैदिक मंत्रोच्चार द्वारा मूर्ति के अंगों में दिव्य प्राणों का संचार किया जाता है।

आपको क्या प्राप्त होता है?
इस संपूर्ण 7-दिवसीय महाअनुष्ठान के पश्चात, आपकी पावन मूर्ति को संपूर्ण मर्यादा के साथ पैक किया जाता है और इसके साथ भेजा जाता है:
- वैदिक प्रतिष्ठा प्रमाण पत्र (Certificate of Authenticity): आचार्य जी द्वारा हस्ताक्षरित एवं अनुष्ठान की तिथि सहित।
- स्थापना विधि पुस्तिका (Sthapana Guide): आपके गृह-मंदिर में मूर्ति के स्वागत, स्थापना और नित्य पूजन के सरल नियम।